जखौली/ उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में बंजर होती खेती और लगातार बढ़ते पलायन की गंभीर चुनौती के बीच रुद्रप्रयाग जिले से उम्मीद की सुखद व हरी-भरी तस्वीर सामने आई है। जिले के विकासखण्ड जखोली ऊखीमठ और अगस्त्यमुनि में उत्तराखंड चाय विकास बोर्ड द्वारा चाय बागान तैयार करने की अनूठी पहल रंग लाने लगी है। यह परियोजना स्थानीय ग्रामीण महिलाओं के लिए आर्थिक समृद्धि के नए द्वार खोल रही है जिससे उनके जीवन स्तर में बड़ा गुणात्मक सुधार देखा जा रहा है।
रणनीतिक योजना के तहत चाय विकास बोर्ड ने अकेले जखोली विकास खंड के ललूड़ी, पूजारगांव, कंपनियां, पोंठी और लौंगा जैसे कई गांवों की लगभग 70 हेक्टेयर बंजर भूमि को चाय बागानों में तब्दील कर दिया है और इस रकबे का लगातार विस्तार किया जा रहा है। उत्तराखंड में चाय उत्पादन का इतिहास बेहद गौरवशाली रहा है जिसकी शुरुआत सबसे पहले वर्ष 1843 में कैप्टन हडलसन द्वारा पौड़ी गढ़वाल से हुई थी। इसके बाद 1844 में देहरादून के कोलागीर में विशाल सरकारी चाय बागान स्थापित किया गया। बदलते वक्त के साथ सिमटती इस अनमोल विरासत को सहेजने और पर्वतीय क्षेत्रों में स्वरोजगार की नई राह बनाने के उद्देश्य से फरवरी 2004 में ‘उत्तराखंड चाय विकास बोर्ड’ का गठन किया गया।
बोर्ड के स्थानीय पर्यवेक्षक कुशाल सिंह रावत ने बताया कि वर्तमान में अकेले जखोली क्षेत्र में ही लगभग 350 महिलाओं को चाय बागानों में सीधा और सतत आजीविका का माध्यम मिला हुआ है। इन बागानों से सालाना लगभग 7,000 किलोग्राम हरी चायपत्ती का उत्पादन हो रहा है जिसमें पौधों की उम्र बढ़ने के साथ ही उत्पादन और गुणवत्ता में भारी इजाफा होना निश्चित है कंपनियां गांव की स्थानीय निवासी संतोषी देवी ने इस मुहिम को पहाड़ के लिए वरदान बताते हुए कहा पलायन की मार से हमारे गांव खाली हो रहे थे और उपजाऊ जमीनें झाड़ियों में तब्दील होकर बंजर हो रही थीं। परन्तु अब ये खेत चाय की हरी पत्तियों से लहलहा रहे हैं।
जब हमें घर के पास ही बेहतर आजीविका मिल रही है तो लोग शहरों की तरफ रुख क्यों करेंगे हमें पूरा विश्वास है कि इस हरियाली को देखकर पलायन कर चुके लोग एक दिन अपने वतन वापस जरूर लौटेंगे। स्पष्ट है कि चाय विकास बोर्ड की यह महत्वाकांक्षी पहल न केवल बंजर धरती का सीना हरा कर रही है, बल्कि ‘रिवर्स पलायन’ और महिला सशक्तिकरण की दिशा में भी एक बड़ा मील का पत्थर साबित हो रही है।