जेनी उस वक्त सही थी या आज झूठ बोल रही है, 23 वर्षों में कई बार वदले अपने बयान 2004 खुद कहा था हरक सिंह रावत पर आरोप झूठे हैं।

न्यूज़ 13 प्रतिनिधि देहरादून

देहरादून/ उत्तराखंड की राजनीति में लगभग 23 साल पुराने जेनी प्रकरण ने एक बार फिर से जबरदस्त हलचल मचा दी है सात नवंबर को उत्तरांचल प्रेस क्लब में पत्रकारों के सामने मुखातिब हुई जेनी ने पूर्व कैबिनेट मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत पर दुष्कर्म का आरोप लगाते हुए अपनी आपबीती सुनाई। उन्होंने मानसिक अस्पताल में रखे जाने जबरन हस्ताक्षर कराने के साथ ही जांच के दौरान उनके साथ हुए कथित व्यवहार पर गंभीर सवाल उठाए। अपने 23 वर्षीय बेटे के लिए पिता का नाम मांगते हुए उन्होंने डीएनए परीक्षण कराने की मांग भी की। परन्तु इस बार जेनी के आरोपों के साथ वर्ष 2004 की एक पुरानी अखबारी खबर भी चर्चा में है। 18 जुलाई 2004 को अमर उजाला में प्रकाशित इस खबर की हेडलाइन थी वक्त के साथ ही बदलता रहा जेनी का रंग।

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इस खबर में जेनी के बयानों में आए ऐसे बदलाव का जिक्र था जिसने उस वक्त भी पूरे प्रकरण को कई सवालों के बीच खड़ा कर दिया था। अमर उजाला की इस रिपोर्ट के अनुसार जेनी ने एक समय साफ कहा था- ‘मेरे साथ कोई बलात्कार नहीं हुआ डॉ. हरक सिंह रावत पर आरोप झूठा है। मुझे आत्मग्लानि हो रही है। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख था कि 17 जून 2003 और 18 जुलाई 2004 के बीच जेनी का सिर्फ बयान ही नहीं बदला बल्कि उनका पूरा रुख अलग दिखाई देने लगा था। पहले वह हरक सिंह रावत पर लगाए गए आरोपों से पीछे हटती नजर आईं लेकिन बाद में फिर उन्होंने आरोप दोहराए और सीबीआइ की जांच रिपोर्ट पर असंतोष जताया। खबर में यह भी दर्ज था कि सीबीआइ की ओर से डॉ. रावत को क्लीन चिट दिए जाने के बाद जेनी ने आक्रामक रुख अपनाया था। उन्होंने विशेष मजिस्ट्रेट की अदालत में आपराधिक शिकायत दर्ज कराई थी। उनका कहना था कि उनके साथ बलात्कार हुआ है और वह सीबीआइ की रिपोर्ट से संतुष्ट नहीं हैं। उन्होंने अपने पुत्र अंजन के पिता का नाम सार्वजनिक करने की बात भी कही थी। यानी आज से लगभग 22 साल पहले ही जेनी के बदलते बयानों को लेकर सवाल उठने लगे थे।

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तब भी एक तरफ वह हरक सिंह रावत को आरोपों से मुक्त बताती थीं और दूसरी तरफ फिर उन्हीं पर गंभीर आरोप लगाती नजर आती थीं।

तब सीने में दबा लिया था दर्द या अब सामने आया सच?

अब सवाल यह है कि 2004 में जेनी ने हरक सिंह रावत पर लगाए आरोपों को झूठा क्यों बताया था क्या उस वक्त उन पर कोई दबाव था? क्या वह वास्तव में अपने पहले आरोपों को वापस लेना चाहती थीं या परिस्थितियों ने उन्हें ऐसा बयान देने के लिए मजबूर किया था? यदि उस वक्त का बयान ही सच था तो आज 23 साल बाद फिर वही आरोप क्यों? दूसरी ओर जेनी के मौजूदा आरोपों को भी केवल पुराने बयान के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। उन्होंने इस बार मानसिक अस्पताल में रखे जाने और जबरन हस्ताक्षर कराने जैसे नए दावे किए हैं। इनकी पुष्टि के लिए संबंधित अस्पताल के अभिलेख जांच एजेंसी के दस्तावेज और उस वक्त की न्यायिक कार्यवाही महत्वपूर्ण होंगी।

नौकरी का भरोसा यौन शोषण का आरोप और बेटे के जन्म से शुरू हुई कहानी

जेनी प्रकरण की शुरुआत वर्ष 2002 के आखिर में हुई थी। उपलब्ध मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक असम की रहने वाली इंदिरा देवी उर्फ जेनी दिसंबर 2002 में देहरादून पहुंची थीं।

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उस वक्त राज्य में नारायण दत्त तिवारी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी और डॉ. हरक सिंह रावत कैबिनेट मंत्री थे।जेनी ने आरोप लगाया था कि नौकरी दिलाने का भरोसा देकर उनके साथ शारीरिक संबंध बनाए गए और बाद में उन्हें सरकारी आवास में रखा गया। 15 जून 2003 को उन्होंने देहरादून के सरकारी अस्पताल में एक बच्चे को जन्म दिया। इसके बाद उन्होंने हरक सिंह रावत को बच्चे का पिता बताते हुए यौन शोषण के आरोप लगाए। 18 जून 2003 को यह मामला विधानसभा में गूंजा। विपक्ष ने सरकार को घेरा और निष्पक्ष जांच की मांग उठाई। विवाद बढ़ने के बीच हरक सिंह रावत ने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने आरोपों को राजनीतिक साजिश बताते हुए कहा था कि जब तक वह बेदाग साबित नहीं होते विधानसभा में प्रवेश नहीं करेंगे।

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सीबीआइ जांच दुष्कर्म का मुकदमा और डीएनए रिपोर्ट मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने सीबीआइ जांच की संस्तुति की। जांच के दौरान जेनी और संबंधित लोगों के बयान दर्ज किए गए। 25 जुलाई 2003 को जेनी के बयान के आधार पर हरक सिंह रावत के खिलाफ दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज किया गया था। जांच के दौरान बच्चे और हरक सिंह रावत के डीएनए नमूनों का परीक्षण कराया गया। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार दोनों के नमूनों का मिलान नहीं हुआ। इसके बाद बच्चे का जैविक पिता होने के आरोप में हरक सिंह रावत को क्लीन चिट मिलने की बात सामने आई। परन्तु डीएनए रिपोर्ट के बाद भी प्रकरण पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। जेनी के बदलते बयानों और शिकायतों ने मामले को लगातार सुर्खियों में बनाए रखा। 12 लाख रुपये की पेशकश का आरोप भी आया था सामने वर्ष 2003 में ही जेनी के संरक्षण गृह में रहने के दौरान एक और विवाद सामने आया मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक संरक्षण गृह की एक कर्मचारी पर जेनी को शिकायत वापस लेने के लिए 12 लाख रुपये देने की पेशकश करने का आरोप लगा था। बताया गया था कि एक कर्मचारी 16 अगस्त को जेनी के पास रकम और बिना हस्ताक्षर वाला शपथपत्र लेकर पहुंची थी। तत्कालीन प्रशासनिक जांच में संरक्षण गृह की एक रसोइया सरोज पर आरोप सही पाए जाने की जानकारी सामने आई थी। इसके बाद उसे स्थानांतरित करने और जांच रिपोर्ट सीबीआइ को भेजने का निर्णय हुआ था।

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यह घटनाक्रम भी इस बात का संकेत था कि मामला केवल आरोप और डीएनए जांच तक सीमित नहीं रहा बल्कि इसके इर्द-गिर्द कई अन्य विवाद भी खड़े होते रहे।

2016 में दुबारा फिर बदला घटनाक्रम हरीश रावत पर लगाए आरोप

लगभग 13 साल बाद वर्ष 2016 में जेनी प्रकरण एक बार फिर चर्चा में आया इस बार जेनी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत और उनके सहयोगियों पर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि उन्हें हरक सिंह रावत के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने के लिए उकसाया गया था। इसके बाद मुख्यमंत्री के निजी सचिव कमल सिंह रावत की शिकायत पर देहरादून में जेनी के खिलाफ आपराधिक षड्यंत्र, झूठे साक्ष्य और रंगदारी से संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज होने की जानकारी सामने आई थी। पुलिस ने उनकी तलाश शुरू की लेकिन उस वक्त उनका पता नहीं चल पाया इस घटनाक्रम ने पुराने मामले को एक नया राजनीतिक रंग दे दिया। एक ओर हरक सिंह रावत अपने ऊपर लगे आरोपों को राजनीतिक साजिश बताते रहे वहीं दूसरी ओर जेनी ने भी तत्कालीन सरकार के लोगों पर आरोप लगाए। 2026 में फिर आमने-सामने आए पुराने किरदार अक्टूबर 2026 में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने हल्द्वानी में पुराने जेनी प्रकरण का उल्लेख कर कांग्रेस पर निशाना साधा। इसके बाद भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने भी बच्चे के पिता की पहचान को लेकर सवाल उठाए। हरक सिंह रावत ने पलटवार करते हुए कहा कि उनका डीएनए परीक्षण पहले ही हो चुका है और वह निर्दोष साबित हुए हैं। उन्होंने अपनी बेगुनाही दोहराई और आरोपों को राजनीतिक साजिश बताया। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने जेनी को कभी छुआ तक नहीं। इसी बीच जेनी के नाम से इंटरनेट मीडिया पर एक वीडियो सामने आया। इसमें उन्होंने नेताओं से उनके नाम पर राजनीति बंद करने की अपील की थी। उन्होंने कहा था कि इतने वर्षों में किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि वर्ष 2003 में उनके साथ वास्तव में हुआ क्या था।

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इसके बाद सात नवंबर को जेनी उत्तरांचल प्रेस क्लब पहुंचीं। इस बार उनके आरोपों में मानसिक अस्पताल में रखे जाने, सीबीआइ अधिकारियों के सीमित संपर्क और जबरन हस्ताक्षर कराने के दावे भी शामिल थे। उन्होंने अपने बेटे के लिए पिता का नाम और डीएनए परीक्षण की मांग दोहराई।

अब फिर वही सवाल- आखिर सच है क्या?

लगभग 23 साल के इस घटनाक्रम में जेनी के बयानों के कई रंग सामने आए हैं। वर्ष 2003 में लगाए गए आरोप वर्ष 2004 में सामने आया आरोपों से पीछे हटने वाला बयान फिर शिकायत और आरोपों की वापसी वर्ष 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत पर लगाए गए आरोप और अब वर्ष 2026 में हरक सिंह रावत पर फिर से दुष्कर्म का सीधा आरोप। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जेनी की किस बात को सच माना जाए? क्या 2004 में उनका बयान किसी दबाव का परिणाम था या आज लगाए जा रहे आरोपों के पीछे कोई नई परिस्थिति है क्या मानसिक अस्पताल में रखे जाने और जबरन हस्ताक्षर कराने के दावों की पुष्टि पुराने दस्तावेजों से हो सकती है।

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यह भी जरूरी है कि वर्ष 2003 की सीबीआइ जांच डीएनए रिपोर्ट, दुष्कर्म के मुकदमे के अंतिम निस्तारण और वर्ष 2004 में दर्ज शिकायत से जुड़े मूल अभिलेख सार्वजनिक तथ्यों के आधार पर देखे जाएं। तब सीने में दर्द दबा लिया था या जुबां पर सच आ गया था या फिर आज 23 साल से सीने में दफ्न टीस जख्म बनकर जमाने के सामने नुमाया हो गई है जेनी के बदलते बयानों के बीच यह सवाल आज भी अनुत्तरित है। परन्तु इतना जरूर है कि इस प्रकरण का सच न तो केवल सामने आएगा और न ही किसी एक पुराने बयान से। इसके लिए 23 साल के घटनाक्रम दस्तावेजों और सभी पक्षों के दावों की राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से निष्पक्ष पड़ताल जरूरी है।

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