देहरादून/ पुष्कर सिंह धामी सरकार का कार्यकाल अब अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रहा है। किंतु इन वर्षों में सरकार के कामकाज को परखा जाए तो तस्वीर चमकदार नारों और घोषणाओं के पीछे छिपी गहरी निराशा की दिखाई देती है। डबल इंजन सरकार का शोर जितना हल्ला मचाया था उतनी ही कमजोर ज़मीन पर खड़े है इसके वादे। धामी सरकार ने खुद को युवाओं की सरकार कहा था।
परन्तु भर्ती घोटाले, लीक होती पेपर और अधूरी जांचों ने इस वर्ग का विश्वास तोड़ दिया। उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UKSSSC) की परीक्षाओं में हुई धांधलियों ने हजारों अभ्यर्थियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया। सरकार ने जांच के नाम पर कुछ अधिकारियों को हटाया लेकिन सिस्टम वही पुराना सुस्त और संदिग्ध बना रहा।
महंगाई के साथ ही बेरोज़गारी पर भी मौन है धामी सरकार
राज्य में बेरोज़गारी दर लगातार बढ़ती जा रही है। उद्योग और निवेश के नाम पर बड़ी-बड़ी घोषणाए की गई किंतु ज़मीनी हकीकत यह है कि पर्वतीय क्षेत्रों के गाव खाली हो रहे हैं।
युवाओं को रोज़गार की तलाश में मैदान या महानगरों का रुख करना पड़ रहा है। महंगाई ने आम नागरिक की कमर तोड़ दी ऐसे में सरकार के पास न राहत योजना है न कोई ठोस रणनीति। उत्तराखंड जैसे संवेदनशील पर्वतीय राज्य में पर्यावरण संरक्षण सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए थी। परन्तु खनन, अवैध निर्माण और अनियोजित परियोजनाओं ने प्रकृति की भी कमर तोड़ के रख दी। जोशीमठ धंसाव भू जैसी त्रासदिया सरकार की नीतिगत विफलता की प्रतीक बनी हुई है। आपदाओं के बाद राहत कार्यों में देरी और पारदर्शिता नहीं होने से जनता के आक्रोश बढ़ता जा रहा है।
शासन में है पारदर्शिता की कमी
भ्रष्टाचार तबादला नीति के साथ ही मनमाने फैसले-इन सबने प्रशासन की साख गिराई है। मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर ज़िला स्तर तक जवाबदेही का अभाव हर जगह साफ़ दिखाई देता है। लोकायुक्त बिल वर्षों से लटका पड़ा है जबकि भ्रष्टाचार मुक्त शासन के नारे रोज़ दोहराए जाते हैं।
धामी सरकार का एक बड़ा हिस्सा प्रतीकात्मक राजनीति में बीता – धार्मिक आयोजनों तीर्थ परियोजनाओं और संस्कृति संरक्षण के नारों के बीच। जनता की बुनियादी समस्याए शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़कें और पेयजल – सब कोशों पीछे छूट गए। धर्म के नाम पर सत्ता साधी गई विकास के नाम पर राजनीति। पुष्कर सिंह धामी के कार्यकाल ने उत्तराखंड को वह स्थिरता और दृष्टि नहीं दी जिसकी उसे आवश्यकता थी। न नीति स्पष्ट दिखाई दी न नीयत यह कार्यकाल न तो युवाओं का रहा न किसानों का न पहाड़ों का। यह केवल प्रचार का शासन रहा- जहा काम कम और कैमरा ज़्यादा चला।