चमोली/ पर्वतीय क्षेत्रों में बारिश हमेशा जीवनदायिनी नहीं होती अक्सर यही बारिश लोगों के लिए भय, नुकसान और बेबसी का पर्याय बन जाती है। चमोली जिले के नारायणबगड़ स्थित थरालीबगड़ क्षेत्र में गुरुवार देर रात हुई महज एक घंटे की मूसलाधार बारिश ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि पर्वतीय क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाएं केवल मौसम की मार नहीं बल्कि वर्षों से लंबित व्यवस्थागत कमियों की भी कहानी कहती हैं। बारिश के बाद कोलूसैंण के जंगलों से भारी मात्रा में मलबा और विशाल बोल्डर आबादी की ओर आ गए। कुछ ही मिनटों में बाजार मलबे से पट गया दुकानों में पानी के साथ आई मिट्टी भर गई वाहन दब गए राष्ट्रीय राजमार्ग बंद हो गया और पेयजल व्यवस्था भी चरमरा गई।
प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक खतरे की जद में आ गया। अच्छी खबर यह है कि इस बार जनहानि नहीं हुई लेकिन नुकसान जरूर हुआ और लोगों के मन में फिर वही सवाल उठने लगा कि क्या हर साल यही हाल रहेगा? थरालीबगड़ के लोगों के लिए यह कोई नई घटना नहीं है। स्थानीय लोगों के मुताबिक वर्ष 1992 से यह क्षेत्र हर मानसूनों में जलभराव और मलबे की समस्या झेल रहा है। हर बार प्रशासन मौके पर आता है नुकसान का आकलन होता है राहत और मुआवजे की घोषणाएं होती हैं परन्तु स्थायी समाधान की दिशा में कोई ठोस कदम आज तक नहीं उठाए जा सके हैं। दरअसल समस्या केवल अधिक बारिश की नहीं है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अनियोजित जल निकासी पहाड़ियों का लगातार कटाव, समय पर सुरक्षात्मक दीवारों का निर्माण न होना और बरसाती नालों का वैज्ञानिक प्रबंधन न होने के कारण ऐसी घटनाएं बार-बार विकराल रूप ले रही हैं।
जलवायु परिवर्तन के दौर में कम वक्त में अत्यधिक वर्षा की घटनाएं बढ़ रही हैं जिससे पर्वतीय क्षेत्रों की संवेदनशीलता और बढ़ गई है। थरालीबगड़ की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि ऊंचाई से आने वाला पानी और मलबा सीधे बाजार और आबादी की ओर रुख करता है। यदि बरसाती धाराओं का वैज्ञानिक उपचार, मजबूत रिटेनिंग वॉल, चेक डैम, ड्रेनेज चैनल और ढलानों का संरक्षण वक्त रहते किया जाए तो नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। लेकिन वर्षों से इन उपायों पर गंभीरता से काम नहीं हुआ। इस घटना ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि पहाड़ों में आपदा प्रबंधन केवल राहत और बचाव तक सीमित नहीं रह सकता। आवश्यकता आपदा पूर्व तैयारी की है। संवेदनशील क्षेत्रों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण, जल निकासी का पुनर्गठन, भूस्खलन संभावित स्थलों का उपचार और स्थानीय समुदाय की भागीदारी के बिना ऐसी समस्याओं का स्थायी समाधान संभव नहीं है।
थरालीबगड़ की यह त्रासदी केवल एक क्षेत्र की कहानी नहीं बल्कि पूरे हिमालयी उत्तराखंड के सामने खड़ी उस चुनौती का प्रतीक है। जहां विकास और आपदा प्रबंधन के बीच संतुलन बनाने की जरूरत लगातार महसूस की जा रही है। यदि हर वर्ष होने वाली घटनाओं से सबक लेकर दीर्घकालिक योजना नहीं बनाई गई तो आने वाले वर्षों में नुकसान और बढ़ सकता है। अब समय केवल राहत राशि बांटने का नहीं बल्कि ऐसी योजनाएं लागू करने का है जो आने वाली पीढ़ियों को हर मानसून के डर से मुक्त कर सके। थरालीबगड़ के लोग भी यही चाहते हैं कि हर बरसात उनके लिए आफत नहीं सामान्य मौसम बनकर आए। इसके लिए सरकार, प्रशासन और तकनीकी विशेषज्ञों को मिलकर स्थायी समाधान की दिशा में निर्णायक कदम उठाने होंगे।