चम्पावत, ऐसी सुंदर आबोहवा व शांत परिवेश को छोड़कर हम क्यों बन रहे हैं मैदानी क्षेत्रों में भीड़ का हिस्सा? ब्रिगेडियर चौबे। ब्रिगेडियर बनने के बाद अपने गांव पहुंचे दीपक का किया लोगों ने भव्य स्वागत।
लोहाघाट/ पहाड़ में रहते हुए हमने मडुवे की रोटी व मादरे का भात खा कर शताब्दियों से कठोर जीवन शैली में जीना हमें अपने पूर्वजों से विरासत में मिला है। यही वजह है कि पहाड़ के व्यक्ति का इरादा चट्टानी होता है। जिस मडुवे वह मादरे को खाकर हम बड़े हुए हैं आज यही श्रीअन्न के नाम से दुनिया के लोगों को परोसा जाने लगा है। इसकी पौष्टिकता के बारे में हमारे पूर्वजों को पहले ही पता था।
यह बात 90 ब्रिगेड के कमांडर बनने के बाद पहली बार अपने सुई चौबे गांव की माटी का तिलक लगाने आए दीपक चौबे ने अपने स्वागत में कही। लोहाघाट पहुंचने पर उनका प्रमुख समाजसेवी सचिन जोशी, गिरीश कुंवर, टीका सिंह बोरा,
भास्कर गढ़कोटी, नंदन तड़ागी, बलवंत गिरी, मोहन पाटनी, हयात सिंह भंडारी आदि ने उनका तथा उनकी धर्मपत्नी काजल चौबे का स्वागत किया। एक सामान्य एवं प्रतिष्ठित शिक्षित परिवार में जन्मे ब्रिगेडियर चौबे की सादगी, आत्मीय व्यवहार की शालीनता ने