उत्तराखंड वन विभाग में ट्रांसफर पर विवाद, 11 दिन में बदला सिविल सर्विस बोर्ड का फैसला अधिकारियों में मचा हड़कंप।

न्यूज़ 13 प्रतिनिधि देहरादून

देहरादून/ 11 दिन में तबादला आदेश रद्द उत्तराखंड वन विभाग में तबादला नीति एक बार फिर सुर्खियों में है। सिविल सर्विस बोर्ड के 1 अगस्त को लिए गए फैसले को मात्र 11 दिन के अंदर पलट दिया गया जिससे विभाग में हड़कंप मच गया। इस कदम ने तबादला प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

विनय भार्गव का तबादला स्थगित, मुख्यालय में अटैच

वन संरक्षक विनय कुमार भार्गव को हाल ही में नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व का प्रभारी बनाया गया था।

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परन्तु शासन ने अब इस आदेश को अस्थायी रूप से स्थगित कर दिया और उन्हें देहरादून स्थित प्रमुख वन संरक्षक के कार्यालय में अटैच कर दिया। सबसे बड़ी हैरानी की बात यह रही कि इस बदलाव का कोई स्पष्ट कारण आदेश में दर्ज नहीं किया गया।

हाईकोर्ट का दखल और शासन का कदम पीछे खींचना

तबादला सूची जारी होते ही विवाद बढ़ा और मामला हाईकोर्ट पहुंच गया। आईएफएस अधिकारी विनय भार्गव और पंकज कुमार ने कोर्ट का रुख किया। कोर्ट ने भले ही भार्गव को राहत नहीं दी लेकिन पंकज कुमार के तबादले पर शासन को पुनर्विचार का निर्देश दिया।

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इसके बाद शासन ने स्वयं ही भार्गव का तबादला रद्द कर दिया और उन्हें मुख्यालय में अटैच करने का आदेश जारी किया। इस घटनाक्रम ने वन विभाग के अंदर कई तरह के सवाल खड़े कर दिए हैं।

मंत्री की चुप्पी और अफसरों में असमंजस

 वन मंत्री सुबोध उनियाल ने इस पूरे विवाद पर मौन साध लिया है। तबादला आदेशों में कारणों का आभाव और त्वरित बदलाव ने विभागीय अधिकारियों में असमंजस और अनिश्चितता की स्थिति पैदा कर दी है।

बार-बार तबादले बने विवाद का केंद्र

वन विभाग में लगातार तबादले विवाद की सबसे बड़ी जड़ माने जा रहे हैं। कई अफसरों को दो साल से भी कम वक्त में बार-बार स्थानांतरित किया गया।
हाईकोर्ट में भी यही तर्क दिया गया कि लगातार तबादले से कार्यक्षमता प्रभावित हो रही है।

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सूची में कई ऐसे नाम शामिल हैं जिनके तबादले बार-बार हुए।विभागीय हलकों में इसे अब जंगल का खेल कहा जा रहा है।
तबादला नीति पर उठते सवाल विशेषज्ञों का मानना है कि बार-बार होने वाले तबादले ने प्रशासनिक अस्थिरता को बढ़ाते हैं विभाग के दीर्घकालिक लक्ष्यों को प्रभावित करते हैं अधिकारियों के बीच अनिश्चितता और असुरक्षा पैदा करते हैं अब यह सवाल और जोर पकड़ रहा है कि क्या उत्तराखंड में तबादला नीति को और अधिक पारदर्शी और व्यवस्थित करने की जरूरत है।

नतीजा

शासन के हालिया फैसले ने जहां अफसरों में हड़कंप मचा दिया है वहीं यह मामला राज्य की तबादला नीति पर गहरी बहस को जन्म दे रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस मसले को किस तरह संभालती है।

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