देहरादून/ सत्ता का चरित्र तब साफ़ दिखाई देता है जब लोकतंत्र की आँखों में धूल झोंकी जाती है और उत्तराखंड वन विकास निगम में हुआ यह पूरा मामला उसी धूलभरी आंधी जैसा है जिसमें संविधान, शासन के साथ ही महामहिम राज्यपाल का आदेश भी कहीं कोने में पड़ा हुआ है।उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के विभाजन को 25 साल हो गए। लेकिन शायद पहली बार हुआ है कि उत्तराखंड जैसे शांत पहाड़ी राज्य में राज्यपाल के स्पष्ट आदेशों को एसे सरेआम नज़र-अंदाज़ किया गया और वह भी उन्हीं अधिकारियों के द्वारा किया गया जो संविधान की शपथ लेकर पद पर बैठे थे।10 फरवरी 2022 को विभागीय चयन समिति की बैठक में उत्तराखण्ड वन विकास निगम में तैनात सात लॉगिंग अधिकारियों को नियमों को ताक पर रखकर पदोन्नति दी गई।
और यह सब तब हुआ जब राज्य में आचार संहिता लागू थी यानी जब सरकारी फैसले ठहर जाते हैं उस वक्त अफसरशाही ने अपनी मर्जी से फैसला सुना दिया। आदेश आया 22 फरवरी और 8 मार्च को और जैसे लोकतंत्र की ताबूत में कीलें ठोक दी गईं जब शासन की नींद खुली तो उसने तुरंत पदोन्नतियों को रद्द कर दिया। कहा ये नियमविरुद्ध हैं और सभी परवर्ती प्रोन्नतिया स्वतः अमान्य होंगी। राज्यपाल ने भी इस पर अपनी सहमति दी। लगा अब न्याय होगा लेकिन उत्तराखंड में न्याय कोई गंगा नहीं जिसे हर कोई छू सकता है। वो एक अफसर की मुहर पर ही बहती है। प्रबंध निदेशक शर्मा गए जोशी आए फिर राव, और फिर आए पांडेय जी लेकिन सिस्टम नहीं बदला। निगम के तत्कालीन एमडी जीएस पांडेय ने तो महामहिम राज्यपाल के आदेश को एक नोटशीट की तरह उड़ा दिया।
शेर सिंह जिन्हें रिवर्ट कर वापस लॉगिंग अधिकारी बनाया जाना था उन्हें उल्टा प्रोन्नत कर क्षेत्रीय प्रबंधक बना दिया गया। जब सचिव स्तर से पत्र गया तब राज्यपाल ने भी आदेश दिया फिर किसके इशारे पर हुआ ये सब क्या जीएस पांडेय अकेले यह सब कर सकते थे या फिर किसी ताकतवर मंत्री, अफसर या गॉडफादर का वरदहस्त था ये वही सवाल हैं जिनसे उत्तराखंड का शासन आज भी मुह चुरा रहा है। इन सात इन सात अधिकारियों में से पांच लोग रिटायर्ड हो चुके हैं जबकि शेर सिंह को पदोन्नति मिली वो भी नियमविरुद्ध । लेकिन उनसे सीनियर अधिकारी जगदीश राम वहीं खड़े-खड़े देखते ही रह गए। शायद योग्यता का पैमाना अब नियम नहीं रिश्तों की गर्माहट बन गई है।
वर्ष 2022 में जब ये फैसला लिया गया उस वक्त प्रदेश में विधानसभा चुनाव के चलते आदर्श आचार संहिता लागू थी। यानी चुनाव आयोग भी इस खेल में मूक दर्शक बना रहा। वन विकास निगम ने तय किया था कि आचार संहिता के बाद ही पदोन्नति होगी। लेकिन क्या कहा जाए जब अफसर खुद ही चुनाव आयोग से ऊपर उठ जाएं अब नए प्रबंध निदेशक नीना गैरवाल ने चार्ज लिया है। उनसे उम्मीद की जा रही है कि वो कम से कम महामहिम राज्यपाल के आदेश का पालन करेंगी। पर क्या सवाल उठाना उनका अकेला काम है क्या अब तक की चुप्पी पर कोई जवाबदेह नहीं है इस पूरे प्रकरण पर मुख्य सचिव और विभागीय मंत्री सब चुप हैं। जैसे सबको पता है क्या हुआ है लेकिन किसी के बोलने की हिम्मत नहीं है क्योंकि अगर शेर सिंह की रिवर्टमेंट हो गई तो कई और अधिकारियों की गोटियां भी उलट-पलट सकती हैं।
शेर सिंह आज भी क्षेत्रीय प्रबंधक कोटद्वार में डटे हुए हैं। आदेशों की यह अवहेलना ना सिर्फ राज्यपाल के पद की गरिमा को ठेस पहुंचाती है बल्कि यह भी दर्शाती है कि राज्य में अब शासन नहीं अफसरशाही चल रही है और लोकतंत्र धीरे-धीरे एक तमाशा बनता जा रहा है।
अगर राज्यपाल का आदेश रद्दी की टोकरी में जा सकता है तो आम नागरिक की आवाज़ किस गिनती में आएगी अगर अधिकारी ही संविधान बन जाएं तो फिर आम जनता को अदालतों के चक्कर क्यों लगाने पड़ते हैं क्योंकि यह सिर्फ खबर नहीं लोकतंत्र के ताबूत में हथौड़ी की एक और चोट है। इस सम्बन्ध में जब वन विकास निगम की नवनियुक्त एमडी नीना गैरवाल से फोन पर संपर्क साधा तो उन्होंने अपना फोन रिसीव नहीं किया। वहीं इस पूरे प्रकरण के विवादित अधिकारी शेर सिंह ने तमाम प्रमाणित तथ्यों को खारिज करते हुए अपनी पदोन्नति को वैध बताया है।