रामनगर/ जंगलों में सफाई के नाम पर हो रहा है एक ऐसा खेल, जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। जबकि राज्य सरकार पलायन रोकने और स्थानीय लोगों को रोजगार देने के प्रयासों में जुटी हुई है, रामनगर डिवीजन के डीएफओ दिगंत नायक ने इस काले धंधे को फलने-फूलने का रास्ता खोल दिया है। सफाई के नाम पर एक बाहरी ठेकेदार को ठेका दिया गया है, जो पहले ही जंगलों को नुकसान पहुंचाने के आरोपों में फंसा हुआ था। सवाल यह है कि यह ठेका किसकी इजाजत से दिया गया और इसके पीछे वन विभाग की मंशा क्या है? रामनगर डिवीजन के डीएफओ दिगंत नायक पर आरोप है कि उन्होंने उत्तर प्रदेश के एक ऐसे ठेकेदार को जंगलों में सफाई का ठेका दिया है, जिसने पहले ही तराई पश्चिमी डिवीजन में अवैध कटाई के मामलों में खुद को आरोपी पाया है। लेकिन इसके बावजूद, डीएफओ ने उसे सफाई का ठेका दे दिया। क्या यह एक जानबूझकर की गई गलती है या फिर वन विभाग की योजनाओं का हिस्सा? यह सवाल अब चुपके-चुपके हर किसी की जुबां पर है।
सफाई के नाम पर जंगलों में अब कुछ और ही हो रहा है। मजदूरों को लगाया जा रहा है, जो चुपके से सागौन के पेड़ों पर चढ़कर उन्हें काट रहे हैं। इन पेड़ों को काटने के बाद ट्रैक्टर ट्रॉली में भरकर बाहर भेज दिया जा रहा है, और पेड़ों को चिप्स की शक्ल में बड़े उद्योगों में बेचा जा रहा है। यह काम दिन-रात चल रहा है, लेकिन वन विभाग ने इसे रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया। यह सबसे हैरान करने वाली बात है – इन ट्रैक्टर ट्रॉली में न तो कोई रजिस्ट्रेशन नंबर होता है, और न ही इनका कोई हिसाब रखा जाता है। ये बिना नंबर वाले ट्रैक्टर ट्रॉली जंगलों से अवैध रूप से पेड़ काटकर बाहर भेजते हैं, और वन विभाग न तो इन्हें रोकने की कोशिश कर रहा है, न ही इस गोरखधंधे पर कोई नज़र रख रहा है। क्या डीएफओ इस पूरी साजिश में शामिल हैं, या फिर वे जानबूझकर आँखें मूंदे बैठे हैं? जब राज्य सरकार पलायन रोकने के लिए राज्य के स्थानीय लोगों को रोजगार देने का दावा करती है, वहीं रामनगर डिवीजन के डीएफओ के फैसले ने स्थानीय मजदूरों को रोजगार देने के बजाय बाहरी ठेकेदारों को मौका दिया है।
क्या यह कदम राज्य सरकार की नीति के खिलाफ नहीं है? क्या वन विभाग की इस चुप्पी से साफ नहीं होता कि वे राज्य के हित में काम नहीं कर रहे हैं? इस पूरे मामले पर जब डीएफओ दिगंत नायक से बात की गई, तो उन्होंने सिर्फ यह कहा, “जहां सरकार बजट पास करती है, वहां हम मजदूरों को काम पर लगाते हैं।” ओर कहीं बजट बस नहीं होता है और सफाई व्यवस्था भीं जरूरी है लेकिन सवाल यह उठता है कि यदि सचमुच सफाई का काम हो रहा होता, तो अवैध कटाई और बाहरी ठेकेदारों को काम पर क्यों रखा जाता? क्या यह सब सिर्फ एक खेल है, जो जंगलों की बर्बादी की ओर ले जा रहा है? अब यह सवाल हर किसी के मन में उठ रहा है कि क्या डीएफओ दिगंत नायक के इस कृत्य को नजरअंदाज किया जाएगा, या फिर वन विभाग इस खेल को रोकने के लिए कोई ठोस कदम उठाएगा? राज्य सरकार और वन विभाग की मंशा पर गहरे सवाल उठने लगे हैं, और अब देखना यह है कि क्या उन पर कार्रवाई होती है या फिर यह गोरखधंधा यूं ही चलता रहता है।