गौरीकुंड केदारनाथ यात्रा का मुख्य पड़ाव लेकिन केदारनाथ बाबा की चल विग्रह डोली के गौरीकुंड आने से पहले ही मां गौरामाई अपने शीतकालीन प्रवास के लिए गौरी गांव चली जाती है, जानिए क्या है मान्यता।

न्यूज़ 13 प्रतिनिधि रूद्रप्रयाग:-

रूद्रप्रयाग/ केदारनाथ धाम के मुख्य पड़ाव गौरीकुंड यही बाबा केदारनाथ के दर्शन करने के लिए यात्री दुर्गम उच्च हिमालई क्षेत्र की पैदल यात्रा शुरू करते हैं। गौरीकुंड में मां गौरा माई का मंदिर मौजूद है और यहां की खास बात ये है कि बाबा केदार की उत्सव डोली के गौरीकुंड पहुंचने से पहले ही गौरा माई अपने शीतकालीन गद्दीस्थल को रवाना हो जाती है।

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जिससे बाबा केदार व गौरा माई का मिलन नहीं होता है। इसके पीछे एक मान्यता है। जिसके बारे में आपको बता रहे हैं शनिवार को सुबह ठीक 8 बजे पुजारी विमल जमलोकी एवं ब्राह्मणों ने वैदिक मंत्रोच्चारण एवं पौराणिक रीति रिवाज के साथ भक्तों के दर्शनार्थ मां गौरा माई के कपाट बंद किए।

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गौरा मां की डोली मंदिर की एक परिक्रमा करने के बाद गौरी गांव के लिए रवाना हुई। इस दौरान भक्तों एवं क्षेत्रीय ग्रामीणों के जयकारों से पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया। मां गौरामाई के गौरी गांव पहुंचते ही ग्रामीणों ने फूल मालाओं एवं अक्षतों से मां का जोरदार स्वागत किया। और गौरामाई की भोग मूर्ति को चंडिका मंदिर में विराजमान किया गया। अब शीतकाल के छह महीने तक इसी स्थान पर मां गौरामाई की पूजा अर्चना की जाएगी।

यह है मान्यता:-

भगवान भोलेनाथ ने मां पार्वती के अंग निर्मित गणेश से युद्ध करने के बाद उसका सिर काट दिया था। जिससे गौरामाई भगवान भोलेनाथ से नाराज हो गई। इसलिए केदारनाथ की उत्सव डोली गौरीकुंड पहुंचने से पहले गौरामाई की डोली गर्भगृह से बाहर आकर अपने शीतकालीन प्रवास गौरी गांव के लिए रवाना हो जाती है।

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ताकि भोलेनाथ और गौरामाई का मिलन नहीं हो सके। केदारनाथ धाम के कपाट खुलने से पहले गौरामाई के मन्दिर के कपाट खुलने की परंपरा है। कहा जाता है जब भगवान भोलेनाथ केदारनाथ के लिए जातें हैं फिर उस दिन भगवान शिव व पार्वती का मिलन होता है।

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